तृप्ति की प्राप्ति खोज में है। जिसकी तलाश है, उसकी प्राप्ति का मार्ग भी खोज में ही निहित है।
मनुष्य सदियों से परम सत्य, परमात्मा और अपने वास्तविक स्वरूप की खोज करता आया है। हम अपनी समस्याओं के समाधान, सुख, शांति और संतोष को प्रायः बाहरी संसार में खोजते हैं। किंतु क्या जिस प्रश्न का संबंध हमारे अपने अस्तित्व से है, उसका उत्तर क्या बाहर की दुनिया में मिल सकता है?
समस्या यदि हमारी है, तो उसके समाधान की खोज भी हमें स्वयं करनी होगी। जिस स्थान से प्रश्न उत्पन्न हुआ है, उसके उत्तर का सूत्र भी कहीं न कहीं वहीं छिपा है। जब मनुष्य बाहरी भटकाव से हटकर अपने अंतर्मन की ओर देखता है, तब उसके भीतर नए बोध का उदय होता है। जिस प्रकार कमल के खिलने से सरोवर की शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार सत्य का बोध होने पर आत्मा आनंदित होती है और जीवन में शांति, संतोष तथा पूर्णता का अनुभव होने लगता है।
परम सत्य की खोज से परमात्मा की पहचान तक
इस पथ भ्रष्ट संसार में मार्ग दर्शन के लिए महापुरुष उतरते ही रहे हैं, जो अपने चरणों की पद छाप और अनुभवी वाक्य छोड़ जाते हैं, मुमुक्षवों को चलने के लिए। जिन पर चलकर उन्हें मंजिल पानी सुगम हो जाती है। हर अगले आने वाले ने, पिछले आए हुए पुरुषों के उन्मानों और ज्ञानों को अपने ज्ञान से कम जताया। पिछलों के मुकाबले मार्ग में सुगमता दी, जिसने मुमुक्षवों को चलने में अच्छी गति दी। इसी प्रकार स्वामी श्री प्राणनाथ जी (मेहराज ठाकुर) भी आए, जिन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय कार्य किया। उन्होंने जगत के समस्त ग्रंथ, वेद, शास्त्र, उपनिषद, भागवत तथा चारों आसमानी किताबें (जबूर, तौरेत, इंजील और कुरान शरीफ़) जो जगत में एक प्रकार से बंद पड़ी थीं। जिनके अर्थ साधारण अकल सही से नहीं कर पा रही थी। उन्होने ग्रंथों के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान के सार को अपनी वाणी के माध्यम से स्पष्ट किया और उन्हें एक नवीन ग्रंथ ‘कुलजम स्वरूप’ के रूप में प्रकट किया। जिनके अर्थों को स्वामी जी ने खोलकर दुनिया को एक तरह से अनर्थों से बचा दिया। क्योंकि दुनिया अर्थों के अनर्थ कर रही थी। सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार, श्री प्राणनाथ जी को “विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक” कल्कि अवतार तथा “इमाम मेहदी” के रूप में माना जाता है। विभिन्न धार्मिक परंपराओं के ग्रंथों में वर्णित संकेतों, लक्षणों और भविष्यवाणियों के साथ-साथ श्री प्राणनाथ जी के कार्यों को भी एक-दूसरे से संबद्ध करते हुए उनकी पहचान इन स्वरूपों के रूप में स्पष्ट की गई है।
कुलजम स्वरूप में परम सत्य-ज्ञान का प्राकट्य
कुलजम स्वरूप में विभिन्न धर्मों के ज्ञान के अतिरिक्त ऐसा परम सत्य-ज्ञान भी प्रकट किया गया है, जो इससे पूर्व उपलब्ध धार्मिक ग्रंथों में इस रूप में प्रकट नहीं हुआ था। इसमें परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा “श्री राज जी” के दिव्य संदेश तथा उनके वास्तविक स्वरूप से संबंधित ज्ञान को भी प्रस्तुत किया गया है। उनकी वाणियों में पारब्रह्म परमात्मा श्री राज जी के वास्तविक स्वरूप, उनके आगमन तथा ब्रह्म आत्माओं के परमात्मा के साथ शाश्वत संबंध से संबंधित ज्ञान और संकेत भी प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें से कुछ चौपाइयाँ इस प्रकार हैं—
चौ०: 44: {कुलजम स्वरूप: बड़ा कयामत नामा प्र०:6} चौ०: 1: {कुलजम स्वरूप: कलश प्र०:23}
आगम की बानी कही, पिया आवेगे तहकीक। सुन्यो दुनिया आखरी, भाग बड़े है तुम।
तिन आसा मेरी बँधी, पूरण आये प्रतीत।। जो कभी कानों ना सुनी, सो करो दीदार खसम।।
चौ०: 5: {कुलजम स्वरूप: खुलासा प्र०:11} चौ०: 6 : {कुलजम स्वरूप: खुलासा प्र०:11}
मैं आया हक का हुकम, हक आएगा आखिरत । उतरी अरवाहें अर्श से, रूहें बारे हजार ।
कौल किया हकें मुझ सों, मैं ल्याया हक मारफत ॥५॥ और उतरी गिरो फरिस्ते, और कुन से हुआ संसार ॥६॥
पारब्रह्म श्री राज जी का आगमन
वाणी के माध्यम से स्वामी श्री प्राणनाथ जी ने यह बताया है कि महाप्रभु पारब्रह्म श्री राज जी की अर्धांगिनियाँ (ब्रह्म आत्माएँ) अपने परमधाम से पहली बार इस नश्वर मृत्युलोक में यहाँ के दुःखों को देखने के लिए आई हुई हैं। इस नश्वर जगत में आकर उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मृत कर दिया है। कारणवश, महाप्रभु पारब्रह्म श्री राज जी स्वयं उन्हें लेने के लिए इस मृत्युलोक में पहली बार पधारने वाले हैं। और, वे ब्रह्म आत्माओं तक पारब्रह्म श्री राज जी के आगमन का संदेश पहुँचाने के लिए आए हैं, ताकि वे अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कर सकें, और अपने पारब्रह्म परमात्मा के साथ अपने शाश्वत संबंध का बोध प्राप्त कर सकें। उन्होंने यह भी बताया है कि आज इस दुनिया का सौभाग्य है कि ब्रह्म-अंगनाओं की कृपा से इस दुनिया को पारब्रह्म से मिलने का अवसर प्राप्त होने वाला है, वह परम सत्य परमात्मा, जो इससे पूर्व कभी इस नश्वर जगत में नहीं आए।
श्री हादी रतनबाई जी और श्री सतगुरू सांकुंडल बाई जी
इन वाणियों में पारब्रह्म परमात्मा के आगमन के साथ-साथ उनकी विशेष धाम अंगना “रतनबाई जी” तथा “श्री सांकुंडल बाई” की भूमिका का भी विशेष वर्णन मिलता है। वाणी में यह संकेत दिया गया है कि पारब्रह्म श्री राज जी, श्री रतनबाई जी के साथ इस नश्वर जगत में मिलेंगे।
इन वाणियों के अनुसार, पारब्रह्म श्री राज जी और रतनबाई जी की पहचान कराने का सामर्थ्य केवल “श्री सांकुंडल बाई” में ही होगा। वे ही वह विशेष आत्मा हैं, जो पारब्रह्म परमात्मा को पहचानकर ब्रह्म आत्माओं को उनसे मिलाने में समर्थ होंगी। इसी विशिष्ट कार्य के कारण श्री सांकुंडल बाई को “खुदाई इमाम” कहा गया है। साथ ही, इन वाणियों में खुदाई इमाम की पहचान किन विशेष लक्षणों, कार्यों और प्रमाणों के आधार पर की जाएगी, इसका भी संकेत मिलता है। सम्प्रदाय की परंपरा में इसी विशिष्ट भूमिका को “श्री सतगुरु” की भूमिका के रूप में माना गया है।
श्री सतगुरु सांकुंडल बाई ठाकुर प्रताप सिंह जी
सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार, “श्री ठाकुर प्रताप सिंह जी” ही वह “खुदाई इमाम” हैं, जिन्होंने कुलजम स्वरूप की वाणियों में निहित गूढ़ ज्ञान को समझा और उसके वास्तविक अर्थों को प्रकट किया। उन्होंने ही इन वाणियों में दिए गए संकेतों को समझकर पारब्रह्म श्री राज रतन जी की पहचान कराई और यह बताया कि पारब्रह्म श्री राज जी इस नश्वर जगत में किस रूप में विराजमान हैं। उन्होंने ब्रह्म आत्माओं को “लादुन्नी ज्ञान” से परिचित कराया तथा श्री राज जी को जाहिर एवं कायम करके, ब्रह्म आत्माओं को पारब्रह्म श्री राज जी के प्रति ईमान, दृढ़ विश्वास एवं असीम प्रेम का मार्ग दिखाया।
इन वाणियों के गूढ़ संकेतों को प्रकट करने और उनके वास्तविक अर्थों को सामने लाने वाली उनकी इसी महत्वपूर्ण आध्यात्मिक भूमिका से यह पहचान प्रकट हुई कि श्री ठाकुर प्रताप सिंह जी ही श्री सांकुंडल बाई जी, अर्थात् “खुदाई इमाम” हैं। इसी कारण सम्प्रदाय में उन्हें “श्री सतगुरु सांकुंडल बाई ठाकुर प्रताप सिंह जी” के रूप में स्वीकार किया गया और यह सम्मान प्रदान किया गया।
महमत कहै गुरु सोई किजें, जो अलख का देवे लख।
इन उलटी से उलटाय के पिया प्रेम करावे सनमुख॥
इस वेबसाइट का उद्देश्य
यह वेबसाइट इसी परम सत्य के ज्ञान, आध्यात्मिक परंपरा और मार्गदर्शन को एक स्थान पर प्रस्तुत करने के उद्देश्य से बनाई गई है, ताकि जिज्ञासु और मुमुक्षु पारब्रह्म श्री राज जी, परमधाम, ब्रह्म आत्माओं के वास्तविक स्वरूप तथा परमात्मा के साथ उनके शाश्वत संबंध से संबंधित ज्ञान को समझ सकें।Top of Form
इस वेबसाइट पर पारब्रह्म श्री राज जी के आगमन से संबंधित वाणियों में दिए गए संकेतों, तथा श्री सतगुरु जी द्वारा इन वाणियों के गूढ़ अर्थों को प्रकट कर प्रदान किए गए लादुन्नी ज्ञान को व्यवस्थित एवं सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है।